DIG की मदद से परिवार की लौटी खुशियां

संवाददाता: शैलेंद्र शर्मा

आजमगढ़। चार वर्ष तक अपनों से दूर रही विक्षिप्त वृद्धा जब स्वजनों से मिली तो उसकी आंखों से आंसू छलक आए। सुधबुध खोई सी वृद्धा हाथ जोड़े बगैर बोले मानों ढेरों संदेश देना चाह रही थी। डीआइजी ने उसे इशारों में बात की तो उसके आंसू मानो जवाब दे रहे थे। विक्षिप्त महिला के स्वजनों को ढूंढ़ने तथा उनके तक पहुंचाने की कोशिशों के दौरान महिला को खाकी में अभिभावक का अक्स दिखने लगा था। इसी के साथ ट्रेन का समय होने को हुआ तो डीआइजी सुभाष चंद्र दुबे ने वृद्धा को उसके दामाद संतोष के संग कोतवाली से कोयंबटूर के लिए रवाना किया।

आजमगढ़ यूं तो 60 वर्षीया नाग लक्ष्मी कई वर्षों से डीआइजी आवास के ईदगिर्द घूमकर जीवन यापन कर रही थीं। विक्षिप्त होने तथा तमिल बोली भी उसे लोगों से दूर कर दी थी। 11 माह पूर्व डीआइजी की वृद्धा पर नजर पड़ी तो उनकी मदद की ठानी। उनके रहने की जिम्मेदारी महिला पुलिस को सौंप दी। उसके बाद एनजीओ की मदद ली, लेकिन बार-बार वृद्धा के भाग जाने से मुश्किलें बढ़ती गई। इस बीच एक तमिल भाषी चिकित्सक की मदद लेने से भी बात नहीं बनी तो खुद के स्नेह का हथियार चलाया। मसलन, वृद्धा के खाने, पीने, कपड़े का ख्याल खुद से रखने लगे। इससे वृद्धा धीरे-धीरे ठीक होने लगी। सोशल मीडिया की मदद ली गई लेकिन निराशा मिली। डीआइजी ने उसे कलम कापी दिए तो वृद्धा ने दो मोबाइल फोन नंबर लिख डाले। इतना क्लू हथियार बन गया। मोबाइल फोन नंबर संतोष कुमार, निवासी कोयम्बटूर, तमिलनाडु का निकला। वाट्सएप के जरिये बात कराई गई तो संतोष कुमार ने वृद्धा को अपनी सास बताया। उसके बाद वीडियो कालिग करके पहचान करायी गयी फिर डीआइजी ने संतोष के आजमगढ़ आने की व्यवस्था की। संतोष 31 दिसंबर को पहुंचे, तो पुलिस अधिकारियों के सामने अपनी सास की पहचान की। संतोष ने बताया कि उनके ससुर का देहांत वर्ष 2016 में हुआ तो विक्षिप्त हो गई नागलक्ष्मी वर्ष 2017 की गर्मियों में लापता हो गयी। स्वजनों ने ढूढ़ने का प्रयास किया लेकिन थक-हारकर बैठ गए थे कि एक फोन काल ने पूरे परिवार की खुशियां लौटा दीं। डीआइजी ने कहाकि इसे सेवा ने उन्हें जीवन भर की खुशियां दे दी है।

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