रिपोर्टर: जेड ए खान
अलीगढ़ (Aligarh) में एक कलाकार ने कला के माध्यम से उस दर्द को सामने लाने का प्रयास किया है, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। बांग्लादेश (Bangladesh) में अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामने आई एक भीभत्स और भयावह घटना को लेकर देशभर में आक्रोश है। इसी क्रम में अलीगढ़ की डॉ. लक्ष्मी ने एक गंभीर और भावनात्मक पेंटिंग बनाकर उस अमानवीय घटना के प्रति संवेदना और विरोध प्रकट किया है। यह पेंटिंग सामान्य रंगों से नहीं, बल्कि तवे की कालोच और दीपक की लौ से तैयार की गई है, जो अपने आप में उस घटना की भयावहता को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती है।
डॉ. लक्ष्मी ने अपनी इस रचना के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि जब समाज में अन्याय और हिंसा होती है और लोग मूकदर्शक बने रहते हैं, तो वह भी एक तरह से संवेदनहीनता का परिचय होता है। उनकी पेंटिंग केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रश्न और चेतावनी भी है।
कला के जरिए सामाजिक मुद्दों पर आवाज:
डॉ. लक्ष्मी का कहना है कि वह लंबे समय से समाज के ज्वलंत मुद्दों पर पेंटिंग बनाकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास करती आ रही हैं। उनके अनुसार कला केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का सशक्त जरिया भी है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में जिस तरह से अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। इसी संदर्भ में दीपू नाम के एक निर्दोष व्यक्ति के साथ हुई घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।
उन्होंने कहा कि जिस तरीके से उस व्यक्ति को बेरहमी से पीटा गया, नंगा कर पेड़ से लटकाया गया और फिर आग के हवाले कर दिया गया, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को अंदर से तोड़ देने के लिए काफी है। इससे भी अधिक पीड़ादायक यह था कि वहां मौजूद लोग उसे बचाने के बजाय वीडियो और सेल्फी लेने में व्यस्त रहे।
कालोच और लौ के प्रतीकात्मक अर्थ:
डॉ. लक्ष्मी ने अपनी पेंटिंग में तवे की कालोच का उपयोग किया है। उन्होंने बताया कि यह काला रंग केवल अंधकार का नहीं, बल्कि उस मानसिक मृत्यु का प्रतीक है, जिसमें इंसान इंसान की पीड़ा देखकर भी कुछ नहीं करता। उनके अनुसार जब शरीर मरता है तो वह काला पड़ जाता है, लेकिन जब संवेदनाएं मर जाती हैं तो समाज भीतर से खोखला हो जाता है। पेंटिंग में कालोच का प्रयोग इसी भाव को दर्शाने के लिए किया गया है।
इसके साथ ही दीपक की लौ का इस्तेमाल भी बेहद अर्थपूर्ण है। डॉ. लक्ष्मी ने बताया कि जब वह दीपक की लौ से पेंटिंग बना रही थीं, तो उनका दिल बार-बार कांप उठता था। लौ उन्हें उस आग की याद दिला रही थी, जिसने एक निर्दोष जीवन को छीन लिया।
पीड़ित परिवार की पीड़ा का अहसास:
डॉ. लक्ष्मी ने कहा कि जब वह पेंटिंग बना रही थीं, तो बार-बार उनके मन में यह सवाल उठ रहा था कि उस समय पीड़ित के माता-पिता पर क्या बीत रही होगी। उनका कहना है कि किसी परिवार के लिए बेटा घर का चिराग होता है और जब वह इस तरह बुझा दिया जाए, तो उस पीड़ा की कल्पना भी कठिन है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी घटनाओं के समय वहां का प्रशासन और सरकार क्या भूमिका निभा रही है। उनके अनुसार यदि समय रहते हस्तक्षेप होता, तो शायद एक निर्दोष जान बचाई जा सकती थी।
संवेदनहीनता पर सवाल:
इस पेंटिंग के माध्यम से डॉ. लक्ष्मी ने समाज की उस संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़े किए हैं, जिसमें लोग किसी की पीड़ा को तमाशे की तरह देखते हैं। उनका कहना है कि यदि ऐसे समय में भी इंसान मदद के लिए आगे नहीं आता, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार होती है।
डॉ. लक्ष्मी की यह कलाकृति अब चर्चा का विषय बनी हुई है और लोग इसे देखकर न केवल घटना की भयावहता को महसूस कर रहे हैं, बल्कि अपने भीतर झांकने को भी मजबूर हो रहे हैं।
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