मराठा आइकन संभाजी महाराज के बाद, राजपूत आइकन राणा सांगा भी विवादों में आ गए हैं, यह तब हुआ जब समाजवादी पार्टी के दलित राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने 15वीं सदी के शासक को मुगल सम्राट बाबर के भारत में प्रवेश में मदद करने के लिए “देशद्रोही” कहा.
फिर क्या था करनी सेना ने रामजी लाल सुमन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और 26 मार्च को आगरा में प्रदर्शन हुआ, सांसद सुमन के आवास पर तोड़फोड़ हुई. इसके बाद क्षत्रिय सभा ने पलटवार करते हुए कहा था कि रामजीलाल सुमन के बयान प्रदेश में गृहयुद्ध कराने का संदेश देते हैं। बंगाल जैसा हाल प्रदेश में भी चाहते हैं। 2027 में बयानों का रिजल्ट भुगतना पड़ेगा। सपा का पूरी तरह से सफाया करना होगा।
सुमन ने माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया और मामला बढ़ता गया, 12 अप्रैल को कुबेरपुर के गढ़ी रामी में रक्त स्वाभिमान सम्मेलन हुआ. लेकिन 14 अप्रैल को रामजी लाल सुमन ने फिर विवादित बयान दे दिया. उन्होंने कहा- अगर तुम यह कहोगे कि हर मस्जिद के नीचे एक मंदिर है तो फिर हमें कहना पड़ेगा कि हर मंदिर के नीचे एक बौद्ध मठ है। गढ़े मुर्दे मत उखाड़ो…अगर उखाड़ोगे तो भारी पड़ जाएगा। 19 अप्रैल को पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव आगरा आ रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं, उन लोगों से कि मैदान तैयार है-दो-दो हाथ होंगे।
फिर क्या 15 अप्रैल को हिंदू महासभा ने सुमन को मंदिर में प्रवेश न देने के पोस्टर लगा दिए. लेकिन मामला बढ़ता गया और इस मामले ने अगड़ा पिछड़ा की लड़ाई धार दे दिया, बवाल के बीच 19 अप्रैल को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव राज्यसभा सदस्य रामजीलाल सुमन से मिलने के लिए आगरा, उनके हरीपर्वत स्थित आवास पर मिलने आए। इस दौरान काफी अव्यवस्थाएं भी हावी रहीं।
सपा अध्यक्ष के आते ही सुमन के आवास के बाहर कार्यकर्ता इतने जोश में आ गए कि धक्का-मुक्की होने लगी। उनके आवास पर सुरक्षा के लिए लगाया गया मेडल डिटेक्टर तक गिरा दिया। बाद में सुरक्षाकर्मियों ने कमान संभाली। इसके बाद कुछ हद तक व्यवस्थाएं संभली। इस बीच अखिलेश यादव ने सपा सांसद के परिजनों के साथ कुछ समय गुजारा। उनके साथ लंच किया और उनके साथ फोटो सेशन कराया।
अब बड़ा सवाल है कि इससे किसको फायदा मिलने वाला है?
जैसे ही बीजेपी रामजी लाल सुमन से माफी की मांग को लेकर दबाव बढ़ा रही है, इंडिया गठबंधन, खासतौर पर समाजवादी पार्टी (सपा), दलित सांसद के घर पर हुए हमले पर ध्यान केंद्रित कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में पासमांदा, दलित और आदिवासी (PDA) वोटों को सफलतापूर्वक एकजुट किया, जिससे उन्हें राज्य में 37 लोकसभा सीटें हासिल करने में मदद मिली, जबकि बीजेपी की सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं. सुमन पर हुए हमले ने अखिलेश के लिए दलित वोटों को और मजबूत करने का अवसर प्रदान किया है. जब करणी सेना ने आगरा में सुमन के घर में तोड़फोड़ की, तो समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव और शिवपाल यादव सुमन के परिवार के साथ एकजुटता दिखाने के लिए मौके पर पहुंचे.
उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी इस घटनाक्रम का प्रभाव पड़ सकता है. लोकसभा चुनावों में दलितों और पिछड़ी जातियों के बीजेपी से अलग होने के कारण पार्टी को भारी नुकसान हुआ था. वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजपूतों की नाराजगी ने भी बीजेपी के वोट शेयर को नुकसान पहुंचाया, जहां यह समुदाय एक महत्वपूर्ण मतदाता समूह है. सवाल है कि क्या अखिलेश यादव इस पुरे मामले से राजनितिक लाभ लेना चाहते हैं?
क्षत्रिय महासभा की याचिका पर जांच का आदेश
वहीँ हाथरस की एमपी-एमएलए कोर्ट ने क्षत्रिय महासभा के प्रदेश महासचिव मतेंद्र सिंह गहलोत की याचिका पर सपा सांसद रामजीलाल सुमन के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने सुमन के अधिवक्ता की आपत्ति खारिज करते हुए क्षेत्राधिकारी को 21 अप्रैल तक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। गहलोत ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि सुमन ने राज्यसभा में महाराणा सांगा को गद्दार कहकर क्षत्रिय समाज का अपमान किया। याचिकाकर्ता ने बताया कि वे स्वयं महाराणा सांगा के वंशज हैं। सुमन ने 22 मार्च को सोशल मीडिया पर भी यह विवादित बयान दोहराया।
बड़ा सवाल है कि बाबर को किसने आमंत्रित किया?
इतिहास की किताबों में अलग अलग बातो का जिक्र है? सवाल बाबर को आमंत्रित करने का नहीं है, सवाल तो अपने वर्चस्व को जिन्दा रखने का है. इतिहास के मंथन में अमृत भी और ज़हर भी. किसी कमर में तलवारें हैं तो किसी के कमर में झाड़ू. वीर योधाओं की गाथाएं भी हैं और कुरीतियों का भण्डार भी है. श्री राम की मर्यादा भी है और सबरी के बेर भी हैं.
लेकिन अब समाज आगे बढ़ चूका है, विकास के पथ पर चल रहा है, अलग अलग जाति और धर्म के लोग साथ काम करते हैं, एक समान, एक स्थान पर बैठते हैं. इस विवाद को भी दो ऐसे लोग एक साथ बैठ के देख रहे होंगे, जिसमे किसी को ऊँचा कहा जाता होगा और किसी को निचा. लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता. फर्क तो बस उन्हें पड़ता हैं जिसके विचारों में दोष हो. फर्क तो उन्हें पड़ता होगा जो आज भी किसी जाति और धर्म विशेष के लिए अपने घर में बर्तन अलग रखते होंगे.
सवाल खुद से करें, हाथ की पांचो उंगलियाँ एक समान नहीं होती, लेकिन एक साथ होती हैं.