लखनऊ (Lucknow) में बहुजन समाज पार्टी (BSP) की बड़ी रैली के बाद समाजवादी पार्टी (SP) ने अपनी सियासी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। सपा (SP) ने इस बार मायावती को छोड़कर सीधे बसपा के राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद (Aakash Anand) पर निशाना साधा है। अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने कहा कि “आकाश आनंद की जरूरत बसपा से ज्यादा भाजपा (BJP) को है।”
दिलचस्प बात यह है कि यही अखिलेश यादव तब मायावती पर आरोप लगा चुके हैं कि उन्होंने आकाश को भाजपा के दबाव में हटाया था। अब वही अखिलेश उन्हीं आकाश पर हमलावर क्यों हो गए? क्या सपा को अपने पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) गठजोड़ के कमजोर पड़ने का डर है? या फिर आकाश की सक्रियता से युवा वोट बैंक खिसकने का खतरा?
मायावती की रैली ने बदली सियासी हवा:
9 अक्टूबर को बसपा (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कांशीराम परिनिर्वाण दिवस पर भव्य रैली कर यूपी की सियासत में हलचल मचा दी। लाखों की भीड़ ने ये संदेश दे दिया कि बसपा अभी भी मैदान में मौजूद है। जो राजनीतिक विश्लेषक बसपा को समाप्त मान रहे थे, उन्हें इस रैली ने चौंका दिया। मायावती ने अपने भाषण में भाजपा की अपेक्षा सपा–कांग्रेस पर अधिक प्रहार किए और अपने पीडीए वोट बैंक को सहेजने की कोशिश की। उन्होंने संकेतों में अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का भविष्य बताते हुए कहा कि “जैसे मुझे कांशीराम ने आगे बढ़ाया था, वैसे ही मैं आकाश को आगे बढ़ा रही हूं।”
सपा–कांग्रेस गठबंधन को लगा झटका:
मायावती की इस रणनीति ने सपा–कांग्रेस गठबंधन के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए का नारा सपा–कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुआ था। इस रणनीति की बदौलत दोनों दलों ने यूपी की 43 सीटें जीतकर भाजपा को खुद के बूते बहुमत हासिल करने से रोक दिया था। अब बसपा के पुनः सक्रिय होने से गठबंधन को दलित वोट बैंक के खिसकने का डर सताने लगा है।

मायावती के बयान पर सपा का पलटवार:
जानकारों का कहना है कि आम तौर पर विपक्षी पार्टियां रैली में सत्ता पर निशाना साधती हैं, लेकिन मायावती ने 9 अक्टूबर के भाषण में इसके विपरीत किया। उन्होंने योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) सरकार की तारीफ करते हुए सपा–कांग्रेस पर सबसे तीखे तंज कसे। उन्होंने कहा कि सपा का चरित्र “दोगला” है, क्योंकि सत्ता में रहते हुए उन्होंने दलित महापुरुषों के नाम से बने जिलों और संस्थानों के नाम बदले थे, और अब सत्ता से बाहर होने के बाद पीडीए का नारा दे रहे हैं।
मायावती के इस बयान के तुरंत बाद अखिलेश यादव ने पलटवार किया और आकाश आनंद पर निशाना साधा। उन्होंने बसपा के बढ़ते प्रभाव को भाजपा की रणनीति से जोड़ने की कोशिश की।
2024 में पीडीए की ताकत का आंकलन:
लोकनीति–सीएसडीएस (CSDS) सर्वे के अनुसार, 2024 के चुनाव में सपा गठबंधन को नॉन–जाटव दलितों का 56% और जाटवों का 25% वोट मिला था, जबकि बसपा को जाटवों का 44% और नॉन–जाटव का 15% वोट मिला। शेष दलित वोट भाजपा गठबंधन के हिस्से में गया। अब जब मायावती ने अपने भतीजे आकाश को सक्रिय करने की घोषणा की है, तो सपा–कांग्रेस को डर है कि उनका पीडीए समीकरण कमजोर पड़ सकता है।
सपा की रणनीति: बसपा को भाजपा से जोड़ने की कोशिश:
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा की मौजूदा रणनीति यह है कि बसपा और आकाश आनंद को भाजपा की “सहयोगी ताकत” के रूप में पेश किया जाए। सपा यह संदेश देना चाहती है कि दलित वोटरों का हित सिर्फ उसी के साथ सुरक्षित है। जानकार कहते हैं कि “2027 के विधानसभा चुनाव में वही पार्टी सत्ता में आएगी जो 21 प्रतिशत दलित वोटरों का भरोसा जीत पाएगी।” इसी कारण सपा और बसपा के बीच यह टकराव और तीखा हो गया है।

बसपा की रैली और सपा की चिंता:
9 अक्टूबर की रैली में उमड़ी भीड़ से सपा को यह आशंका हुई है कि दलित वोटर फिर से अपनी मूल पार्टी की ओर लौट सकता है। मायावती अब खुद बिहार चुनाव के बाद यूपी के अलग-अलग मंडलों में कैडर कैम्प करेंगी, जबकि आकाश आनंद अलग–अलग जिलों में रैलियां और सभाएं करेंगे। इसके जवाब में सपा ने अपने दलित नेताओं को मैदान में उतार दिया है और दलित मुद्दों पर मुखर होने के निर्देश दिए हैं।
सपा का पलटवार और हालिया उदाहरण:
सपा नेताओं को दलित उत्पीड़न के मुद्दे उठाने का निर्देश दिया गया है। रायबरेली (Rae Bareli) में वाल्मीकि युवक की हत्या का मामला इसका ताजा उदाहरण है। सपा सांसद प्रिया सरोज (Priya Saroj) ने मायावती के भाषण पर पलटवार करते हुए कहा कि अगर मायावती चाहतीं तो पिछले आठ वर्षों से सत्ता में बैठी योगी सरकार से बेरोजगारी और दलितों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज उठातीं।
राजनीतिक समीकरण का निष्कर्ष:
साफ है कि यूपी की सियासत में फिलहाल पीडीए ही सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार है। बसपा अपने दलित वोट बैंक को पुनः मजबूत करना चाहती है, जबकि सपा–कांग्रेस उसे अपने साथ बनाए रखने की जद्दोजहद में हैं। ऐसे में आकाश आनंद पर सपा के हमले केवल व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस समीकरण पर हैं जो यूपी की सत्ता की कुंजी तय करेगा।
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