अफगानिस्तान एक बार फिर भीषण प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। रविवार देर रात जलालाबाद के पास आए 6.0 तीव्रता के भूकंप ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। तालिबान सरकार ने जानकारी दी है कि अब तक मृतकों की संख्या 1411 तक पहुंच गई है, जबकि घायलों का आंकड़ा 3250 से अधिक हो गया है। अचानक रात में आए इस हादसे में लोग गहरी नींद में थे और अधिकांश इमारतों के मलबे में दब गए।
भूकंप का केंद्र नांगरहार प्रांत में था, जो राजधानी काबुल से लगभग 150 किलोमीटर दूर और जलालाबाद से करीब 17 मील की दूरी पर स्थित है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने इसे उच्च जोखिम वाले भूकंपीय क्षेत्र यानी रेड जोन बताया है। इस इलाके की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि राहत और बचाव दलों के लिए प्रभावित गांवों तक पहुंचना बेहद कठिन हो रहा है। कई गांव पूरी तरह मलबे में बदल गए हैं।
सबसे ज्यादा मौतें पड़ोसी कुनार प्रांत में हुई हैं, जहां सोमवार को 4.6 तीव्रता का एक और झटका दर्ज किया गया। इससे राहत कार्य और मुश्किल हो गए हैं। अल जजीरा के अनुसार, भूकंप के झटके पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब प्रांत तक महसूस किए गए। भारत के गुरुग्राम में भी हल्के झटके रिपोर्ट हुए।

इस आपदा ने तालिबान सरकार को अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील करने पर मजबूर कर दिया है। भारत ने तेजी दिखाते हुए 1000 टेंट और 15 टन खाद्य सामग्री काबुल और कुनार भेजी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि भारत आने वाले दिनों में भी सहायता सामग्री भेजता रहेगा। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब 2021 में तालिबान सरकार के गठन के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मानवीय सहायता रोक दी थी।
भारत के अलावा ब्रिटेन और चीन भी मदद के लिए आगे आए हैं। ब्रिटेन ने प्रभावित परिवारों के लिए 1 मिलियन पाउंड (करीब 10 करोड़ रुपये) की इमरजेंसी सहायता का ऐलान किया है। वहीं, चीन ने कहा है कि वह अफगानिस्तान की जरूरतों और अपनी क्षमता के अनुरूप मदद भेजेगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की यह पहल प्रभावित लोगों के लिए उम्मीद की किरण साबित हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी इलाकों में बने कच्चे मकानों और कमजोर आधारभूत ढांचे के कारण अफगानिस्तान भूकंपों से अत्यधिक प्रभावित होता है। स्थानीय प्रशासन और बचावकर्मी रात-दिन मलबा हटाने और फंसे लोगों को निकालने में जुटे हैं, लेकिन साधनों की कमी बड़ी चुनौती है।
भूकंप पीड़ितों के पुनर्वास और दीर्घकालिक सहायता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अफगानिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, ऐसे में यह आपदा वहां के लोगों के लिए दोहरी मार लेकर आई है।
यह त्रासदी न केवल अफगानिस्तान के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए मानवीय संवेदना और सहयोग की परीक्षा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग किस तरह से प्रभावित लोगों के जीवन को सामान्य बनाने में मदद करता है।
