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Special Report || किसी भी शिक्षण संस्थान की पहचान वहां की शिक्षा व्यवस्था होती है और अच्छी शिक्षा देने के लिए एक अच्छे शिक्षक की आवयश्कता होती है और शिक्षा ग्रहण करने के अच्छे छात्र की. लेकिन इन दोनों एक चीज़ की अति आवश्यकता होती वो है मन का शांत होना और ध्यान का केन्द्रित होना.

लेकिन गाजीपुर से जो खबरें आ रहीं है उससे तो लगता है कि कुछ लोगों ने मन और ध्यान दोनों को अशांत करने का पूर्ण प्लान बना लिया है. अरे भाई कोई भी कुछ भी बिना किसी कारण तो करता नहीं है. कुछ तो लाभ होगा. हमारे पास दो पत्र आये हैं एक मदरसे का और दूसरा कॉलेज के छात्रों का. एक तरफ ब्लैक मेलिंग का मामला लगता है और दुसरे तरफ एक बड़े षड्यंत्र की बू आ रही है.

शुरुआत करते हैं मदरसे से, उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर के मोहम्दाबाद विधानसभा के ग्राम महेशपुर मच्छत्ती में मदरसा इस्लामिया है. यह 1978 से संचालित है और 1982 में इसे मान्यता मिली. मदरसे के प्रबंधक कहे जाने वाले मोहम्मद मक़सूद खान का कहना है कि मदरसे की नियमवाली के धारा 6 का उलंघन कर अबुल कैश खां नाम के व्यक्ति ने कागजों में हेरा फेरी की और 1992 से 2003 तक मदरसे के अध्यापकों का जीपीएफ करीब 6.5 लाख रूपये का गबन कर लिया. यही नहीं एक अध्यापक को मदरसे से जबरदस्ती निष्काषित कर उनके जगह पर अपनी पत्नी को रख लिया. ये भी नियम विरुद्ध है. इस फर्जी प्रबंधन समिति की जांच मोहम्दाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी ने किया था और इन्हें 2006 में निष्काषित भी कर दिया गया. अबुल के खिलाफ अलग अलग प्राथमिकी भी दर्ज है. अब एक फिर अबुल कैश वही काम कर रहे हैं. अबुल कैश ने तथ्य छुपाकर, फर्जी कमिटी का गठन कर और फर्जी अभिलेख तैयार कर सहायक निबंधक वाराणसी मंडल और जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के कार्यालय में प्रेषित किया है. इस कमेटी अबुल कैश खां बेटें और दामाद सदस्य हैं.

मक़सूद खान का कहना कि यही नहीं ये लोग गाँव में जाकर मदरसे के नाम पर चंदा लेकर लाखों का गबन कर रहे हैं. ये मदरसे की छवि को ख़राब कर रहे हैं और रास्ते में रोककर गली दे रहे और जान से मारने की धमकी भी दे रहे हैं. जब घटना की सुचना स्थानीय थाना पर दी तो कोई कार्रवाई नहीं हुई. रजिस्टर डाक द्वारा पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पात्र दिया तब भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. विवश होकर कोर्ट का शरण लेना पड़ा. मोहम्दाबाद न्यायलय के न्यायिक मजिस्ट्रेट यशार्थ विक्रम ने 1 सितम्बर 2022 को थानाध्यक्ष भांवरकोल को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर विधि अनुसार विवेचना करने का आदेश दिया है.

अब सवाल ये है कि क्या इस घटना का असर शिक्षकों के मानसिक स्थिति पर नहीं पड़ता होगा और उसका असर क्या होगा? खैर परेशानियाँ तो गाजीपुर के पीजी कॉलेज में भी हैं. चाहे परीक्षा हो या प्रवेश छात्र परेशानियों का सामना करता ही है. पिछले दिनों सीएम योगी यहीं आये थे लेकिन परेशानियाँ दूर नहीं हुईं.

पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष दीपक उपाध्याय का कहना है कि छात्रों की समस्याओं को 18 बिंदुओं से इंगित कर गाजीपुर में एक राज्यवित्तीयपोषित विश्वविद्यालय (Ghazipur University) स्थापना व छात्रों को हो रही समस्या को गंभीरता से लेते हुए तत्काल व्यवस्था के तहत पीजी कॉलेज में जौनपुर विश्वविद्यालय का विस्तार पटल खोलने की मांग छात्रों की थी लेकिन कालेज प्रशासन अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए जिला प्रशासन को गुमराह कर छात्रनेताओं को बंधक बनाकर मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया।

वही छात्र नेता निखिल सिंह ने कहा कि एक जिलाधिकारी 1957 ई0 में रहे हैं जिन्होंने 77 एकड़ सरकारी जमीन का पट्टा व स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर लगे यूनिट टैक्स का पैसा लगाकर महाविद्यालय की स्थापना जनहित में किया था और एक जिलाधिकारी राधेश्याम भी थे जिन्होंने सन् 1982-83 में अपने स्वार्थ में कॉलेज के पदेन अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और जिसका परिणाम हुआ कि सारे अधिकारियों को प्रबंध समिति से बाहर कर दिया गया यह बात वास्तविक ओजस्वी मुख्यमंत्री को पता न चले इसलिए छात्रों को पत्रक देंने से रोका गया।

अगर ये बात सही है तो इस कॉलेज के शोषण की कहानी लम्बी है. छात्र संघ के पूर्व महामंत्री हिमांशु यादव ने कहा कि जिस अधिकार की लड़ाई पूर्व जिलाधिकारी राजन शुक्ला लड़ा. उन्होंने माननीय उच्च न्यायालय में जनहित में पैरवी करते हुए पदेन अध्यक्ष पद कि लड़ाई लड़ी, जिस पर आज भी स्टे है तथा केश पैरवी विहिन है. वहीं एक जिलाधिकारी कुशपाल भी थे जिन्होंने जनहित में इस महाविद्यालय की स्थापना करने का काम किया था, लेकिन वर्तमान जिलाधिकारी ने छात्रसंघ प्रतिनिधि मंडल को मुख्यमंत्री से न मिलने का समय देकर विश्वविद्यालय स्थापना में बाधा उत्पन्न कर व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने का काम किया है, जो छात्रों के हित में नहीं है।

मोरल ऑफ़ द स्टोरी समझिये. 1957 में कॉलेज की स्थापना तत्कालीन जिलाधिकारी ने सरकारी जमीन पर करवाया था, आज यहाँ 10 हज़ार से ज्यादा छात्र हैं. कैंपस भी शानदार है, जिसकी तारीफ खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था. गाजीपुर जनपद में 300 से ज्यादा कॉलेज हैं. फिर भी ये जनपद जौनपुर के पूर्वांचल यूनिवर्सिटी पर निर्भर करता है. वाराणसी और जौनपुर में यूनिवर्सिटी है. आजमगढ़ में कॉलेज कम हैं फिर भी यूनिवर्सिटी बन गया. गाजीपुर तो सभी मानक पूरा करता है, फिर क्यों नहीं बन रहा यूनिवर्सिटी? छात्रों की यही मांग है. उनका कहना है कि जब तक नहीं बनता तब तक जौनपुर यूनिवर्सिटी का विस्तार पटल गाजीपुर में कर दें ताकि छात्र दुर्व्यवस्थाओं का शिकार न हों.

भैया गाजीपुर से 100 किलोमीटर दूर है जौनपुर, किसी समस्या को लेकर छात्र वहां के कितने चक्कर लगाएगा? और समस्याओं की कमी भी नहीं हैं. छात्रों का तो ये भी कहना है की इसमें किसी का कुछ बड़ा लाभ है, इसलिए ये छात्रों को मुख्यमंत्री से मिलने नहीं देते. अगर यूनिवर्सिटी बन गया तो इन लोगों की दूकान बंद हो जाएगी.

अब छात्र शिक्षा ग्रहण करें या समस्याओं के समाधान के लिए जौनपुर जायें. Do You Get My Point?

बुधवार को गाजीपुर शहर के रेलवे स्टेशन स्थित श्री शिव दुर्गा मंदिर में छात्र नेताओं ने बैठक कर सरकारी जमीन और सरकारी पैसे से खुले महाविद्यालय मे हो रही समस्याओं को 18 बिंदुओं में इंगित कर मुख्यमंत्री के नाम संबोधित पत्रक को रेलवे स्टेशन स्थित डाक घर से भेजा.

इस मौके पर पूर्व छात्रसंघ उपाध्यक्ष दीपक उपाध्याय, पूर्व महामंत्री हिमांशु यादव, प्रवीण पाण्डेय, निखिल सिंह,देव जोशी, प्रमोद राज,अमन यादव,आयान खान,आदित्य पाण्डेय, अरमान खान, राजेश यादव,रोहन यादव, निखिल जोशी, विकास राजभर इत्यादि छात्र मौजूद थे।

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