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जौनपुर में चार फरवरी 1995 को दोपहर स्टेशन पर गोलियों की तड़तड़ाहट में जीआरपी सिपाही अजय सिंह की मौत से शाहगंज दहल उठा था। अब 27 साल बाद इस मामले में फैसला आया तो लोग इसकी फिर से चर्चा करने लगे। इन 27 वर्षों में इस मामले में 599 तारीखें पड़ीं और 92 पेज का फैसला आया। 4 फरवरी 1995 की दोपहर रेलवे स्टेशन पर सब कुछ सामान्य था। इसी बीच, प्लेटफार्म पर अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती है। आवाज थमी तो पता चला कि घटना जीआरपी कार्यालय पर हुई और गोली लगने से सिपाही अजय सिंह की मौत हो गई। दिनदहाड़े हुई इस घटना में खुटहन के तत्कालीन विधायक उमाकांत यादव समेत सात लोग आरोपी बनाए गए। मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई। बाद में उमाकांत यादव सहित सभी आरोपी जेल भेजे गए। 

अभियोजन पक्ष से सीबीसीआईडी के सरकारी वकील मृत्युंजय सिंह एवं यहां के सरकारी वकील लाल बहादुर पाल व अनिल सिंह कप्तान ने पैरवी की। 599 तारीखों में 19 गवाह परीक्षित कराए गए। दीवानी न्यायालय परिसर में उमाकांत के चेहरे पर शिकन नहीं थी। लेकिन, इनके पिता श्रीपति यादव परेशान दिखे। उमाकांत के अधिवक्ता पुत्र भी हाईकोर्ट से आकर डटे रहे। वह सोमवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट परिसर में मौजूद रहे। 

फैसले के बाद पत्रावली में कागजात की नकल लेने के लिए अधिवक्ताओं से मिलते रहे। लेकिन, जब मीडिया कर्मियों ने उमाकांत यादव से वक्तव्य देने के लिए कहा तो वह बोले कि मंच पर भाषण देना है क्या जो माइक लेकर आ गए और सवाल पूछने लगे।

सीबीसीआइडी के सरकारी वकील मृत्युंजय सिंह ने मृत्युदंड के संबंध में बहस की थी। उन्होंने कहा था कि जब प्रधानमंत्री की उनके आवास के पास हत्या करने वालों को मृत्युदंड दिया जा सकता है तो आरक्षी जो लोगों की रक्षा करता है, उसकी सार्वजनिक स्थान पर हत्या करने वालों को मृत्युदंड क्यों नहीं दिया जा सकता।

जुर्माने की आधी रकम मृतक के आश्रितों और 50-50 हजार घायलों को देने का आदेश दिया। उधर, पूर्व सांसद के वकील कमला प्रसाद यादव ने कहा कि न्यायालय के आदेश का वह सम्मान करते हैं। लेकिन, फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेंगे। 

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