Report || अग्निपथ योजना के विरोध में उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में हुई हिंसक घटनाओं को लेकर पुलिस की कार्रवाई जारी है. इसमें अब तक 46 एफआईआर दर्ज हो चुके हैं और 525 लोग गिरफ्तार किए गए हैं. गिरफ्तार लोगों में 145 लोग शांति भंग की आशंका में गिरफ्तार किए गए हैं. वहीं 380 आरोपी दर्ज हुए केस से जुड़े हैं. अब सवाल उठ रहा है कि एक ही घटना में पत्थरबाजी, आगजनी करने वाले आरोपियों पर दो अलग-अलग तरह की कार्रवाई क्यों की जा रही है?

कानपुर में नमाज के बाद हुई हिंसा के मामले में एनएससी की कार्रवाई की जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ अग्निपथ योजना के विरोध में हिंसक प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर मामूली एफआईआर दर्ज की जा रही है. सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगहों पर पुलिस की कार्रवाई पर यह सवाल खड़ा हो रहे हैं. ख़बरों के अनुसार इस संबंध में उत्तर प्रदेश पुलिस के एडीजी लॉ एंड आर्डर प्रशांत कुमार का कहना है कि अग्निपथ योजना के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शन के पीछे कुछ असामाजिक तत्व और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग शामिल हैं.

पुलिस को अब तक की जांच में इसके पुख्ता सबूत मिले हैं और ऐसे तमाम कोचिंग संचालक और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग गिरफ्तार कर जेल भी भेजे गए हैं. प्रशांत कुमार का कहना है कि जिसका जितना गुनाह होगा उसको उतनी ही सजा मिलेगी. एसएम सेक्टर 10 में कई नौजवान ऐसे भी थे जिन्होंने प्रदर्शन तो किया, लेकिन तोड़फोड़ आगजनी नहीं की. ऐसे ही प्रदर्शनकारियों पर शांति भंग की आशंका में कानूनी कार्रवाई की जा रही है.

ख़बरों के अनुसार मौके से मिले वीडियो फुटेज के आधार पर जिन लोगों ने आगजनी पत्थरबाजी की है, सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में कार्रवाई की जा रही है. ऐसे लोगों से ही नुकसान की भरपाई भी होगी. सरकार छात्रों पर कार्रवाई को लेकर बेहद संवेदनशीलता से काम कर रही है. छात्रों की आड़ में कुछ उपद्रवियों ने हिंसा की है. कानून को अपने हाथ में लिया है. ऐसे लोगों को चिन्हित किया जा रहा है, लेकिन जिन छात्रों ने अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन किया, लेकिन कोई हिंसा या नुकसान नहीं किया उनको भी चिन्हित कर 151 सीआरपीसी में कार्रवाई की जा रही है.

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 151 के तहत जब किसी भी पुलिस अधिकारी को अपराध होने की आशंका हो. सूचना मिले तो वह पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है. कानून की भाषा में इसे निरोधात्मक कार्रवाई कहते हैं. असल में धारा 151 के तहत कोई मुकदमा नहीं चलता, ना ही कोई जुर्माना लगाया जा सकता है. बस आरोपी को गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है. जहां पर उसे अपराध ना करनी है, शांति व्यवस्था भंग नहीं करने की हिदायत के साथ जमानत दे दी जाती है.

साधारण भाषा में सीआरपीसी की धारा 151 को एक टीके की तरह माना जाता है जो किसी भी बीमारी के होने से पहले लगाया जाता है. यानी बीमारी को रोकने के लिए जिस तरह टीका काम करता है, ठीक उसी तरह अपराध घटित होने से पहले उसे रोकने के लिए पुलिस धारा 151 का इस्तेमाल करती है. पुलिस जब किसी व्यक्ति को 151 में गिरफ्तार करती है तो सक्षम मजिस्ट्रेट जरूरत पड़ने पर अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए आरोपी को जमानत पर रिहा कर सकता है.

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