एक दर्शक किसी बात को दो तरह से सोच सकता है. पहला या तो वो बात उसे पसंद या नापसंद हो चाहे उससे उसका कितना बड़ा घाटा ही क्यों न होता हो. दूसरा हर बात निष्पक्षता से सोचना, समझना और अपने हित के साथ समाज हित में भी सही होने पर सहमती जताना, उसके बात उन बातों का समाज में प्रचार भी करना ताकि समाज सही दिशा में सोच सके.

लेकिन गंभीर सवाल तो यही की कोई किसी बातों को सोचे कैसे? क्योकि असली खेल सोच का ही तो है. ये खेल इतना गहरा की सूचनाओं या ख़बरों के माध्यम से इतना सब कुछ दिखा दिया जाता है आप कुछ बेहतर सोच कर भी नहीं सोच पते. वो कहते हैं की एक झूठ को सौ बार बोलो तो वो भी सच लगने लगता है. इसलिए ख़बर को देखते और पढ़ते समय हर दिन नए सिरे से अभ्यास करना पड़ता है. बहुत से दर्शकों को पता नहीं चलेगा कि कुछ मामलों को बेवजह कवर किया जा रहा है.

पत्रकारिता में रिसर्च की कमी काफी देखने को मिल रही. कई जगह तो प्रेस विज्ञप्तियों को बिना पढ़े, बिना सोचे ही प्रकाशित कर दिया जाता है. पत्रकारिता का संबंध मुद्दों के अन्वेषण यानी Investigation से है, जो ऐसे मामले में कभी नहीं किया जाता है. बल्कि इसकी जगह कवरेज के नाम पर पत्रकार होने का अभिनय किया जाता है.

समाज में युवाओं के अंदर आक्रोश और हिंसा की सोच समय के साथ और बढती जा रही है और इसी सोच का असली इस्तेमाल कहीं और होता. जिसकों इतिहास की परिभाषा भी नहीं पता, वो इतिहास के बड़े बड़े दावे करता है और ये दावे जब बार बार होते हैं तो युवाओं को ये सत्य लगने लगता है और संविधान और कानून को भूल जाते हैं और कुछ ऐसा कर बैठते हैं जिससे केवल उनका ही नहीं पुरे समाज का भविष्य अन्धकार में चला जाता है.

सोच स्कूल की आखिरी बेच से सही होनी चाहिए, लेकिन आज जिस तरह से स्कूल का सञ्चालन हो रहा है उससे तो ये मुमकिन नहीं लगता. फिर भी एक पत्रकार होने के नाते सोच पर बात करना भी आव्यश्यक है. ये बाते उन्ही को बुरी लगेंगी जिसकी सोच में हिंसा हो, जिसके सोच में सम्मान की भावना न हो, जिसकी सोच विकास न हो. और एक ऐसी ही सोच नतीजा हमें जनपद गाजीपुर में देखने को मिला.

ख़बरों के अनुसार Ghazipur के शादियाबाद क्षेत्र के बरहट गांव निवासी पुष्पेंदर सिंह उर्फ मनीष (22) का कुछ दिन पहले गांव के ही कुछ युवकों से किसी बात को लेकर विवाद चल रहा था। गुरुवार की रात करीब नौ बजे पुष्पेंदर को आपसी विवाद खत्म करने के लिए घर से कुछ दूरी पर बुलाया गया। वहां मौजूद दो युवकों से बातचीत के बीच विवाद बढ़ गया। इसी बीच एक युवक ने बंदूक से एक के बाद एक पुष्पेंदर पर तीन गोलियां दाग दिया। गोली पेट एवं जांघ में लगी। घटना की जानकारी होते ही परिवार के लोग मौके पर पहुंचे। आनन-फानन में युवक को उपचार के लिए वाराणसी ले जाए। जहां उसका उपचार चल रहा है। परिवार के लोग बिलखते हुए पुष्पेंदर के शीघ्र स्वस्थ होकर घर आने की ईश्वर से कामना करते रहे। घटना को लेकर ग्रामीणों में तरह-तरह की चर्चा होती रही। इस संबंध में थाना प्रभारी विरेंद्र कुमार वर्मा ने बताया कि जानकारी होने पर मौके पर पुलिस पहुंची थी, लेकिन वहां कोई नहीं मिला। पीड़ित की तरफ से अभी तक कोई तहरीर नहीं मिली है। फिर भी मामले की छानबीन की जा रही है।

इस घटना में दो बातें स्पष्ट हैं जिन युवकों पर गोली मरने का आरोप है उनमे बचपन से हिंसा की सोच का विकास हुआ है, इसके अतिरिक्त देश का कानून का अपमान करने की सोच भी खूब विकसित हुई है तभी तो गोली मार दिया. ये भी स्पस्ट होना बाकि है कि गोली जिस असलहे से मारा वो लाइसेंस वाला था या अवैध.

एक अच्छी सोच एक अच्छे भोजन की तरह होता है, जैसे भोजन नमक और मसलों का संतुलन बना रहना चाहिए वैसे सोच में भी शालीनता और तथ्यों का संतुलन बना रहना चाहिए.

लेकिन ज्ञानवापी (Gyanwapi Case) में जनता की सोच क्या है? ये तो फिलहाल जनता ही जानती होगी. ज्ञानवापी मामले में शुक्रवार को जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुआई वाली तीन जजों की पीठ में हुई सुनवाई के बाद अदालत ने केस जिला जज वाराणसी को ट्रांसफर कर दिया है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि जिला जज की प्राथमिकता के आधार पर रखरखाव का मुद्दा तय किया जाएगा.

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 17 मई का हमारा (सुप्रीम कोर्ट का) आदेश 8 सप्ताह तक जारी रहेगा. साथ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वजू की पर्याप्त व्यवस्था जिलाधिकारी करें. डीएम सुनिश्चित करें कि धार्मिक आयोजनों की समुचित व्यवस्था की जाए. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को यूपी ज्यूडिशियल सर्विसेज के सीनियर मोस्ट अधिकारी के समक्ष सुना जाये. अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ग्रीष्मावकाश के बाद जुलाई के दूसरे हफ्ते में सुनवाई करेगा.

न्यायपालिका इसे ही कहते जो सबको सुनती है, समझती है, तथ्य देखती है, सबूत देखती है, फिर भी जिरह करती है और फिर फ़ैसले की घड़ीआती है. लेकिन सोच, सोच ऐसी चीज है की जब एकतरफा हो जाये तो खुद को कानून से ऊपर मानाने लगती है. लोकतान्त्रिक देश में तानाशाह होने परिभाषा का अभिनय किया जाने लगता है. और सवाल करने पर सीधे जनता की सोच के साथ चतुर खेल खेल कर आपको ही गुनेहगार बना दिया जाता है.

दुष्कर्म के आरोपियों के एनकाउंटर के पीछे सोच क्या रही होगी. साल 2019 में हुई दिशा गैंगरेप केस (Disha Gangrape Case) से पूरे देश में सनसनी मच गई थी. तेलंगाना के हैदराबाद में नवंबर 2019 में 27 साल की महिला वेटनरी डॉक्टर के साथ रेप हुआ था. रेप के बाद दिशा (ये बदला हुआ नाम है) की हत्या कर दी गई थी.

डॉक्टर का शव शादनगर में एक पुल के नीचे जली हुई अवस्था में मिला था। इसके बाद हैदराबाद (Haidrabad) पुलिस ने चार आरोपियों – मोहम्मद आरिफ, चिंताकुंटा चेन्नाकेशवुलु, जोलू शिवा और जोलू नवीन को वेटनरी डॉक्टर के साथ सामूहिक दुष्कर्म के और हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किया था। हैदराबाद के NH-44 पर इन चारों आरोपियों एनकाउंटर किया गया था। एनकाउंटर उस समय हुआ था जब चारों आरोपियों को पुलिस मौके पर क्राइम सीन की पहचान के लिए ले गई थी. उसी समय आरोपी भागने लगे तब पुलिस ने एनकाउंटर किया था. इस घटना के बाद एनकाउंटर करने वाली पुलिस पर फूलों की बारिश की गई थी. लोगों ने इस एनकाउंटर को तत्काल न्याय देने की मिसाल मानी थी.

लेकिन अब हुआ क्या? सिरपुरकर जांच आयोग ने इस मामले, जिसे दिशा दुष्कर्म कांड नाम दिया गया है, की जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी है। इस एनकाउंटर के लिए हैदराबाद पुलिस की देशभर में वाहवाही हुई थी। 
रिपोर्ट में कहा गया है कि कथित चारों आरोपियों का फर्जी एनकाउंटर किया गया था। जस्टिस वीएस सिरपुरकर जांच आयोग ने कहा है कि इस फर्जी मुठभेड़ के दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। मामले की जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट को भेजने का निर्देश देते हुए दोषियों पर कार्रवाई करने को कहा है।

ख़बरों के अनुसार जस्टिस वीएस सिरपुरकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मुठभेड़ पर कई सवाल उठाए हैं.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मुठभेड़ में मारे गए चार आरोपियों में से तीन नाबालिग थे.

रिपोर्ट में लिखा गया है कि अभियुक्तों पर जानबूझ कर इस तरह गोलियां चलाई हैं ताकि वो मर जाएं.

वहीं, मुठभेड़ में शामिल अधिकारियों शाइक लाल मधार, मोहम्मद सिराजुद्दीन और कोचेरला रवि के खिलाफ आईपीसी की धारा 302के तहत ट्रायल होना चाहिए था. इनको IPC की धारा- 76 और धारा 300 के अपवाद तीन के तहत कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए. क्योंकि उन्होंने अभियुक्तों के साथ चाल चली और उनके भरोसे के कत्ल किया.

रिपोर्ट के मुताबिक मुठभेड़ में शामिल सभी दस पुलिस अधिकारी वी सुरेंद्र, के नरसिम्हा रेड्डी, शाईक लाल मधार, मोहम्मद सिराजुद्दीन, कोचेरला रवि, के वेंकटेश्वरुलु, एस अरविंद गौड़, डी जानकीराम, आर बालू राठौड़ और डी श्रीकांत के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के साथ 34 और 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर ट्रायल होना चाहिए. उससे साफ होगा कि इस साझा अपराध में किसकी क्या और कितनी भूमिका रही।

एक बार सबको लगा था कि की पुलिस ने जो किया सही किया लेकिन सब भूल गये हर चीज नियम और कानून से चलती है. आपको फिर भी लग सकता है कि पुलिस ने सही किया था. लेकिन एक बात याद रखिये इस देश का सविंधान और कानून बिल्कुल सही है. जरुरत हर स्तर पर बचपन से ही सकारात्मक सोच पैदा करने की. जब ऐसा होगा तो ऐसी घटनाएं खुद ब खुद ख़त्म हो जायेंगीं.

हिंसा से दूर रहे, अहिंसा का पालन करें, स्कूल में अपने गुरु चाहे वो महिला हो या पुरुष सबका सम्मान करें, किशोर छात्र मित्रता करें लेकिन अपनी सोच में अश्लीलता न लायें. माता पिता अपने बच्चे के गलत कार्य को बढ़ावा न दें. कोशिश तो करें आप सच्चे देश भक्त बन जायेंगें, वरना हिंसा, गुरुर, अश्लीलता ये सब एक सच्चे देश भक्त के लक्षण नहीं हैं. जय हिन्द

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