जनपद गाजीपुर को वीरों की धरती कहा जाता है ना जाने कितने युवा रोज सपने देख कर सुबह उठते हैं और गंगा किनारे या गंगा नदी के पुल पर यह सड़कों पर या गांव की गलियों में व्यायाम करते नजर आ जाते हैं। वह खूब दौड़ते हो इतना दौड़ते हैं कि उनका एक ही सपना होता है कि जब सेना की भर्ती आए तो मैं दौड़ को पास कर जाऊं। अपने देश की रक्षा के लिए मर मिटने का सपना देखने वाले गाजीपुर के वीर जवानों के भविष्य का सपना क्या सरकारें देखती हैं?

सेना में भर्ती होने वाला हर जवान अपनी भारत माता के लिए मर मिटने का जज्बा रखता है अपनी भारत माता की रक्षा के लिए दुश्मनों के छक्के छुड़ाने का जज्बा रखता है। युद्ध हो या ना हो वह सीमा पर खड़े होकर अपने भारत माता की रक्षा करने के लिए तत्पर रहता है। वह चाहे छुट्टियों पर घर आए या छुट्टियों से वापस ड्यूटी करने सीमा पर जाएं, अपने देश की रक्षा करना कि उसकी प्रथम प्राथमिकता होती है। लेकिन जब सेना के जवान अपने प्राण त्याग देते हैं तो सरकारें उनके बलिदान को अलग-अलग परिभाषाओं में बदल देती हैं। युद्ध करते हुए शहादत देने वाले वीर जवानों को शहीद का दर्जा मिलता है। लेकिन जो अपने जीवन को अपने देश के लिए बलिदान करने का जज्बा रखते हुए सेना में आते हैं और उनकी किसी अन्य कारण वश मृत्यु हो जाती है तो उनकी परिभाषा सरकार की किताब में बदल जाती है। उन्हें युद्ध करने का भले ही मौका नहीं मिलता लेकिन अपने देश की रक्षा के लिए वो सेना भर्ती होते हैं और हमेशा दुश्मनों से युद्ध करने के लिए तैयार रहते हैं। गाजीपुर के पूर्व सांसद राधामोहन सिंह का कहना है कि सीमा पर कुछ जगह ऐसी होती हैं जहां पर खड़े होकर ड्यूटी करना भी किसी युद्ध से कम नहीं होता। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। सेना के हर जवान को उचित सम्मान मिलना चाहिए।

जानकारी के अनुसार अक्टूबर 2021 में गाजीपुर के रहने वाले सेना के 2 जवानो की ड्यूटी के दौरान सांस लेने में तकलीफ होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। बताया जा रहा है कि लेह लद्दाख में 17000 फीट की ऊंचाई पर ड्यूटी कर रहे गाजीपुर के खुटवा गांव निवासी ओमप्रकाश बिंद को ऑक्सीजन की कमी के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में एडमिट कराया गया। जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया, वही जखनिया के धीरेंद्र यादव कुपवाड़ा में ड्यूटी कर रहे थे ऑक्सीजन की कमी के कारण उन्हें भी सांस लेने में दिक्कत हुई और आर्मी अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। परिजनों और समाजसेवियों द्वारा सरकार से शहीद का दर्जा देने की मांग की गई। परिजनों का कहना है कि अभी तक उचित सरकारी मदद नहीं मिली है। वहीं पिछले दिनों पूर्व सांसद राधामोहन सिंह ने दोनों जवानों के परिजनों का एक एक लाख रुपए से की आर्थिक सहयोग किया। राधे मोहन सिंह का कहना है कि वह समाजवादी पार्टी की एक टीम के साथ “शहीद” के परिजनों से मिलने पहुंचे थे लेकिन उनकी स्थिति देखकर वह बहुत कुछ सोचने लगे, उस वक्त उनके पास कुछ खास पैसे नहीं थे लेकिन उन्होंने तुरंत अपने पुत्र अनिकेत सिंह द्वारा पैसों का इंतजाम करवाया और परिजनों की मदद की। देखिए पूरी रिपोर्ट
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