ब्यूरो डेस्क | कोरोना संक्रमण बढ़ते प्रकोप को रोकने का एक मात्र उपाय सोशल डिस्टेंस को मेन्टेन करना हैं. ऐसे में सरकार द्वारा पुरे देश में लॉकडाउन किया गया है. आव्यश्यक वस्तुओं में राशन, सब्जी और दवाओं को छुट दिया गया है. लेकिन इन सामानों को खरीदने के लिए भी सोशल डिस्टेंस कि जरुरत है.

शुक्रवार को गाजीपुर आये ADG वाराणसी जोन  ब्रज भूषण ने साफ़ किया था कि “घरों में रहना जरुरी है, केवल आवयश्कता पड़ने पर ही घर से निकले. मोटर साइकल और साइकल पर केवल एक सवारी ही आ जा सकता है, वो भी उसके आने जाने का कारण नियमानुसार हो. चेहरे पर मास्क लगाना अनिवार्य है. यदि कोई इसका उलंघन करेगा तो उचित धाराओं के अंतर्गत उसपर कार्यवाही की जाएगी.”

प्रशासन द्वारा बार बार मना करने के बाद भी आम जनता द्वारा लॉकडाउन के उलंघन के मामले सामने आ रहे हैं और अब इससे बड़ा खेल सामने आ गया. इधर जिलाधिकारी और ADG द्वारा जनता को बताया गया कि लॉकडाउन उलंघन करने पर कार्यवाही होगी और वही दूसरी तरफ कुछ स्कूल द्वारा अपने छात्रों को किताब खरीदने के भ्रमित करने वाला सन्देश दिया गया. ऐसे में क्या था, वैसे तो कुछ अभिभावक पहले ही लॉक डाउन का उलंघन कर गैर क़ानूनी तरीके से खोली गई दूकान पर जा कर किताबें खरीद रहे थे और अब तो स्कूल और दुकान द्वारा उनके इस कार्य में चार चाँद लगा दिया गया.

सबसे बड़ा सवाल है कि किताब, प्रत्येक छात्र के लिए आव्य्श्यक वस्तु है, लेकिन उससे ज्यादा जरुरी है अपनी जान कि रक्षा करना. ऐसे में जब प्रशासन ने बुक स्टाल खोलने कि अनुमति नहीं दी है तो बुक स्टाल खोलना और वहां जाकर खरीदारी करना गैर क़ानूनी है. और जो अध्यापक बच्चों को नियम और कानून सिखाते हैं, आज वही अध्यापक छात्रों और उनके अभिभावकों को गैर क़ानूनी काम करने पर मजबूर कर रहे हैं. सवाल तो उन अभिभावकों पर भी खड़ा होता है जो संपन्न हैं और पैसे कि गर्मी में अपने बच्चों को गैर क़ानूनी रास्ता सिखा रहे हैं. आज गैर क़ानूनी ढंग से छात्र किताबें खरीद रहे और कल कुछ खरीदने कि कोशिश कर सकते हैं.

इस लॉक डाउन में व्यापारियों और कमजोर वर्ग कि कमाई का रास्ता बंद है, ऐसे में बड़ा सवाल खड़ा होता है कि अगर स्कूल छात्रों को किताबें खरीदने पर मजबूर करेगा तो कमजोर वर्ग का व्यक्ति कैसे किताबें खरीद पायेगा.

ABT NEWS और दैनिक भाष्कर कि संयुक्त टीम ने शनिवार की सुबह करीब 7 बजे जब शहर का भ्रमण किया तो पाया कि कुछ बुक स्टाल गैरकानूनी ढंग से अभिभावकों को किताब बेच रहे हैं. कई अभिभावक अपने साथ छात्र को लेकर आये थे. न वहां सोशल डिस्टेंस का पालन हो रहा था और न सरकारी आदेश का.

ABT NEWS और दैनिक भाष्कर कि संयुक्त टीम के आग्रह पर जिलाधिकारी ने छात्रों तक किताबे पहुँचाने कि बात कही, उन्होंने कहा कि हम कुछ बुक स्टाल के नंबर को सार्वजानिक कर देंगे, जिससे कानून को दायरे में रहते हुए छात्रों तक किताबें पहुंचाई जा सकें.

ये पूरी घटना अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाता है. क्या अध्यापक बच्चों को भ्रमित करते हैं? स्कूल ने छात्रों तक किताबें पहुँचाने की अनुमति प्रशासन से क्यों नहीं ली ? स्कूल कर्मचारियों को कोरोना संक्रमण से होने वाले नुकसान के बारे में समझाने पर भी, वो इसका विरोध करते है, तो क्या ऐसे कर्मचारी देश के दोषी नहीं हुए? प्रशासन से अनुमति न लेने के पीछे क्या स्कूल और बुक स्टाल के बिच कमीशन का खेल है?

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