ब्यूरो रिपोर्ट। भारतीय सभ्यता विश्व की मानी जानी एक सभ्यता है, जहां की संस्कृति विश्व में अपना एक अहम स्थान रखती है, लेकिन बदलती राजनीति और बदलते जमाने के साथ आम जनमानस की सोच भी बदलती जा रही है, जहां एक तरफ भारत में सभ्यता का बोलबाला था, ऋषि मुनियों की धरती पर संस्कृति की गंगा बहती थी, जहां देश के कोने कोने में सम्मान सत्कार जिंदा रहता था, जहां हर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का हमदर्द था, जिस देश की हरियाली को देखने के लिए विश्व उत्सुक रहता था, जहां कृष्ण की होली प्रजा में खुशियों की लहर लाती थी, जहां होली प्रकृति के चंदन और गुलाल से खेला जाता था, जहां ठंडाई का सेवन किया जाता था, जहां मधुर संगीत और हंसी ठिठोली से होली की रौनक बढ़ जाती थी, जहां आस-पड़ोस रिश्तेदार मिलकर होली की मिठाइयां खाते थे और सभ्यता वाले मधुर संगीत से मन मोहित हो जाते थे। अब यह सारी बातें केवल किताबों में नजर आती हैं, अब ना कोई अपना है ना होली में भारतीय संस्कृति की झलक है।

अब ऋषि-मुनियों के धरती वाले स्थानों पर होली आधुनिक हो गई है। अब बदलते जमाने की युवाओं की होली, चंदन और गुलाल की जगह केमिकल वाले रंग, ठंडाई की जगह शराब और मधुर संगीत की जगह अश्लील गाने से रंगीन होती है।

इस होली पर ना अब धर्म का डंडा है, ना हीं राजनीतिक पंडित किसी तरह की टिप्पणी करते हैं, ना कोई धर्मगुरु को इससे परहेज है, अब ना ही ऐसी होली पर मीडिया में डिबेट होते हैं, ना यहां औरतों की इज्जत है, ना यहां संस्कार है, सभ्यता को ढूंढो तो गंगा में बह जाती है। तो करें तो क्या करें? अब तो ऐसी होली ही मनाई जाती है ,ना कोई रोक है, ना कोई परहेज।

होली सबके लिए सामान्य है, इसे मनाने का हक भी सबको है, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी भी तो क्या करें? और क्या करें वह पुलिसकर्मी जो आज के इस आधुनिक होली में कोई असुरक्षा ना हो जाए, उसकी रक्षा के लिए अपनी होली को त्याग कर मैदान में डटे रहते हैं, खैर अब तो यही सब है। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद।

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