ब्यूरो रिपोर्ट/गाज़ीपुर। एम0ए0एच0 इण्टर कॉलेज में शोक सभा का आयोजन किया गया जिसमें पूर्व देहान्त हुए शहर के मशहूर साहित्यकार और शायर रईस अहमद, निसार अहमद व रहमत गाज़ीपुरी को श्रद्धांजलि दी गयी। अफाक अहमद ने रईस शहीदी के कार्य और साहित्यिक सफर को बताते हुए कहा कि इनके गीत लोग बहुत पसंद करते थे। इनकी शायरी का अलग ही अंदाज होता था और इनका यह अशआर लोगों के दिल को छूता है-

“क्या समझता है पढ़कर प्रोफेसर हो जाएगा
छोड़ दिल्ली-मुंबई एनकाउंटर हो जायेगा
नजर के सामने कुछ ऐसा मंजर आ ही जाता है
ग़ज़ल में फूल लाता हूँ तो पत्थर आ ही जाता है
मेरी मिट्टी की दीवारों में ऐसा क्या है लोगो
कही शोला उठे ज़द में मेरा घर आ ही जाता है।”

रईस शहीदी मुहल्ला चंदन शहीद के रहने वाले थे और ये शेरी महफ़िल की जान और उर्दू शायरी के मशहूर शायर थे। इनके अदब के दो दौर के बीच की शायरी थी-

“सर किसी और का है सिर्फ बदन मेरा है
फिर भी ज़िंदा हूं तो यह जीने का फन मेरा है
मेरे कमरे में है आराम की चीज
ग़ालिब व मीर की खय्याम की चीज
मुस्कराते हुए गम पीता हूं
ये मुहब्बत है बड़े काम की चीज”

गाज़ीपुर में पुरानी नस्लो में दो शायर जफर और सैफुर्रहमा न अब्बाद है जिन्होंने दो दौर को देखा है जैसा कि रईस साहब ने देखा है। इनके बाद शहर से उर्दू शायरी का दौर खत्म होकर, नई नस्ल के दौर में दाखिल हो जाएगी। देखा जाए तो रईस साहब की शायरी में मुहब्बत, व्यवस्था पर चोट, ज़ुल्म के विरोध आवाज़ मिलती है। जिस तरह वह ग़ज़ल कहने के माहिर थे वैसे ही कतात, नात, हम्द भी खूब कहते थे। वैसे वह गाज़ीपुर में नज़्म के शायर बनकर उभरे थे। कई नज़्में उनकी सुनी हुई है। उनके पढ़ने का अंदाज़ भी खूब था। उनके कई अच्छे शागिर्द भी थे जैसे तरब, हंटर, साजिद, बादशाह राही, तथा अन्य हैं।

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