प्यार ये एक ऐसा शब्द है जो नफरत का अंतिम इलाज है. कुछ लोग खुद तो प्यार की आड़ में अपने हवस की गर्मी को शांत करके समाज और कानून की धज्जियाँ उड़ देते हैं और कुछ तो ऐसे होते हैं जो नफ़रत और गुलामी को ही सामाजिकता मानते हैं. अब वैलेंटाइन डे को ही ले लीजिये. अब इस दिन को किसने बनाया? कैसे बनाया ? मुद्दा इस बात का नहीं होना चाहिए. हर दिन तो इश्वर का होता है. सोचना तो ये चाहिए कि कम से कम 365 दिन में एक दिन तो ऐसा होता है जो प्यार का होता है. स्वतंत्रता के साथ एक व्ययस्क इंसान को जीने दो. उनका साथ दो. उनके अभिभावक बनकर उनके भविष्य के उतार चढाव के बारे में उनको समझाओं. ऐसे में यदि किसी ने गलत साथी का चुनाव किया होगा तो उसी अवधि में उसे समझाने और संभलने का मौका मिलेगा और जो सही होगा उसे विश्वास मिलेगा. लोग कहते हैं कि ये सब जो करते हैं वो अपना भविष्य बर्बाद करते हैं, पढाई नहीं करते, जीवन को उज्वल नहीं बनाते. अरे भईया, ये तो जीवन का हिस्सा है और प्रक्रति ने इंसान को ऐसा ही बनाया है कि ये सब जिस उम्र में होता है, संभवतः उस समय शिक्षा अपने अंतिम और चुनौतीपूर्ण दौर में होता है. अगर आप जाति और धर्म जैसी विचारधारों वाली बीमारी का इलाज कराकर साथ दें तो उसका भविष्य भी उज्वल होगा और वैवाहिक जीवन भी. असली बर्बादी तो तब होती है जब आप इसका विरोध करते हैं. खैर इतना प्रवचन देने का फायदा भी नहीं है क्योंकि इस समाज का अधिकांश हिस्सा तो जाति, धर्म, ऊँच, नीच, महिलाओं को गुलाम बनाकर रखने और दहेज़ प्रथा में विश्वास करता है जो राजनीति का सबसे मजबूत हथियार है. लेकिन ये जरुर याद रखिये कि सब अघोषित रूप से गुलामी, लालच और हिंसा का रूप है जो देश के कानून में भरोसा नहीं करता और देश के कानून में भरोसा नहीं करता उसे क्या कहते हैं …. ये आम बखूबी जानते हैं…
अगर इंसान ऐसी मानसिकता से ग्रसित न होता तो क्या काजल की हत्या होती? और ये भी इत्तेफाक है कि उसकी हत्या का खुलासा भी उसी दिन हुआ जिस दिन लोग प्यार का इजहार करते हैं. काजल पाण्डेय ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिससे उसने शादी की. सात जन्मो तक जीने मरने की कसम खाई, वही उसे अपने जीवन से हटाना चाहता है वो भी इसलिए क्योंकि परिजनों को शादी की बात मालूम नहीं थी और उसने दूसरी शादी कर ली.
दिल्ली की श्रद्धा हत्याकाण्ड से कम नहीं था गाजीपुर का काजल हत्याकाण्ड. बस वहां हिन्दू मुस्लिम का एंगल ढूंढकर टीवी न्यूज़ चैनलों के मैटिनी शो चमचमाते रहे, श्रद्धा के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर उसे कई स्थानों पर फेंका गया और यहाँ काजल की हत्या कर उसके शव को उसकी स्कूटी के साथ गाजीपुर के एक मात्र टूरिस्ट प्लेस लार्ड कार्नवालिस के पास फेंका गया. गाजीपुर सदर कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक तेज बहादुर सिंह, स्वाट टीम प्रभारी रामाश्रय राय और सुनील कुमार तिवारी और उनकी टीम की सूझ बुझ और तहकीकात से काजल हत्याकांड का खुलासा हो गया.
जानकारी के अनुसार आशुतोष दुबे और काजल पाण्डेय प्रेमी-प्रेमिका थे। आशुतोष आईटीबीपी का जवान है. 2019 में दोनों ने कोर्ट मैरिज भी कर लिया था। लेकिन इस बात की जानकारी आशुतोष के परिजनों को हो गई. इसके बाद परिवार के दबाव में आशुतोष की दूसरी शादी भी हो गई। पहली शादी को लेकर परिवार में तनाव रहता था। दूसरी पत्नी के घर वालों ने इसी बात को लेकर आशुतोष पर मुकदमा भी किया था। तभी से आशुतोष पहली पत्नी को अपने रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा। इस काम में अपने दो साथियों को शामिल कर वारदात को अंजाम दिया।
आशुतोष ने अपनी पहली पत्नी काजल को 5 फरवरी, शाम को गाजीपुर वाराणसी मार्ग स्थित सम्राट ढाबा के आगे बुलाया था, जो शहर से नजदीक है। काजल अपनी स्कूटी से आई। आशुतोष और उसके साथियों ने उसको अपनी काले रंग की स्कार्पियों पर बैठा लिया था। फिर तीनों लोगों ने मिल कर गला दबाकर उसकी हत्या कर दी थी। यह भी बताया गया कि मृतका का 30 लाख का बीमा था। जिस कारण हत्या को हादसा दिखाया गया। जिससे उसको पैसा भी मिल सके। घटना को सड़क हादसे का रूप देने के लिए लार्ड कार्नवालिस के पास शव और स्कूटी को फेंककर वो भाग निकले.
स्वाट टीम और कोतवाली पुलिस की संयुक्त टीम ने 2 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। उनके कब्जे से 1 तमंचा और 1 मोटर साइकिल बरामद हुई है। जबकि हत्यारोपी पति आईटीबीपी जवान की गिरफ्तारी को लेकर कार्रवाई तेज कर दी गई है। काजल की हत्या करने वाला आरोपी प्रिंस सिंह उर्फ लड्डू करंडा थाने का हिस्ट्रीशीटर है। उसके खिलाफ करंडा के अलावा शहर कोतवाली, चंदौली के बलुआ थाना में मुकदमे दर्ज हैं। जबकि हत्यारोपी राकेश कुमार केसरी के खिलाफ करंडा और कोतवाली में मुकदमा दर्ज है।
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